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नई दिल्ली: 2006 के 7/11 मुंबई ट्रेन धमाकों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उन 12 लोगों को बरी करने के फैसले पर रोक लगा दी है, जिन्हें इन धमाकों में आरोपी बनाया गया था। हालांकि, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि बरी किए गए 12 लोगों को दोबारा जेल नहीं भेजा जाएगा।
यह फैसला गुरुवार को जस्टिस एमएम सुंदरेश और एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार की अपील पर सुनाया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 21 जुलाई, 2025 को इन सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया था, जिसके बाद वे जेल से बाहर आ गए थे। विशेष मकोका (महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट) अदालत ने पहले पांच आरोपियों को मौत की सजा और सात को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
क्यों जेल नहीं लौटेंगे रिहा हुए लोग?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा है कि चूंकि सभी 12 आरोपियों को पहले ही रिहा किया जा चुका है, इसलिए उन्हें दोबारा जेल भेजने का कोई सवाल ही नहीं उठता। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि बॉम्बे हाईकोर्ट के बरी करने के फैसले को ‘मिसाल’ के तौर पर नहीं माना जाएगा।
महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने का अनुरोध किया था। उन्होंने तर्क दिया कि हाईकोर्ट के फैसले में कुछ ऐसी टिप्पणियां हैं जो महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट (मकोका) के तहत चल रहे अन्य मुकदमों को प्रभावित कर सकती हैं। मेहता ने विशेष रूप से यह नहीं कहा कि रिहा किए गए व्यक्तियों को वापस जेल भेजा जाए, बल्कि उनका मुख्य जोर इस बात पर था कि हाईकोर्ट के फैसले को कानूनी मिसाल के तौर पर इस्तेमाल न किया जाए।
अदालत ने सॉलिसिटर जनरल की इस दलील को स्वीकार कर लिया और फैसले पर सीमित रोक लगाते हुए कहा कि इसे किसी भी अन्य मामले में “मिसाल के तौर पर नहीं माना जाएगा”। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सभी 12 आरोपियों को नोटिस जारी कर महाराष्ट्र सरकार की अपील पर उनका जवाब मांगा है।
मामले की पृष्ठभूमि
11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में सात अलग-अलग जगहों पर सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इन धमाकों में 189 लोगों की मौत हो गई थी और 800 से अधिक लोग घायल हुए थे। इस मामले में विशेष मकोका अदालत ने 2015 में 13 लोगों को दोषी ठहराया था, जिनमें से एक आरोपी की 2021 में मौत हो गई थी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में अपने फैसले में कहा था कि अभियोजन पक्ष इन आरोपियों के खिलाफ “उचित संदेह से परे” अपना मामला साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है, जिसके बाद सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने जांच में कई गंभीर खामियां और सबूतों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे।
