Source The New Indian Express
हैदराबाद: हाल ही में सामने आए एक विजयनागर-युग के शिलालेख ने इतिहासकारों और खगोलविदों दोनों को चकित कर दिया है। यह शिलालेख स्पष्ट रूप से एक धूमकेतु के देखे जाने का वर्णन करता है, और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर, यह माना जा रहा है कि यह हैली के धूमकेतु का अवलोकन हो सकता है। यह खोज प्राचीन भारत में खगोलीय ज्ञान और अवलोकन की सटीकता का एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करती है।
यह शिलालेख, जो वर्तमान में __________ (स्थान का उल्लेख करें यदि उपलब्ध हो, अन्यथा इसे रिक्त छोड़ दें) में स्थित है, उस समय के खगोलीय घटनाक्रमों का विस्तृत विवरण देता है। इसमें धूमकेतु की पूंछ, उसकी गति और आकाश में उसकी स्थिति का वर्णन किया गया है। इतिहासकारों का मानना है कि यह विवरण हैली के धूमकेतु की विशेषताओं से मेल खाता है, जो हर 75-76 साल में पृथ्वी के पास से गुजरता है।
विजयनागर साम्राज्य (1336-1646 ईस्वी) अपने वैज्ञानिक और सांस्कृतिक विकास के लिए जाना जाता था। इस अवधि के दौरान खगोल विज्ञान सहित विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति हुई। यह शिलालेख इस बात का और प्रमाण है कि उस समय के विद्वान और खगोलविद नियमित रूप से आकाशीय पिंडों का अवलोकन करते थे और उनका रिकॉर्ड रखते थे।
प्रोफेसर एम. रामा राव, एक प्रसिद्ध इतिहासकार और शिलालेख विशेषज्ञ, ने कहा, “यह खोज असाधारण है। यह न केवल हमें विजयनागर काल के खगोलीय ज्ञान के बारे में बताता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि उस समय के लोग खगोलीय घटनाओं को कितनी बारीकी से दर्ज करते थे। हैली के धूमकेतु का उल्लेख विशेष रूप से रोमांचक है क्योंकि यह हमें एक विशिष्ट ऐतिहासिक घटना को एक खगोलीय घटना से जोड़ने में मदद करता है।”
खगोलविदों का भी मानना है कि यह शिलालेख महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हैली के धूमकेतु के ऐतिहासिक अवलोकनों की सूची में एक नया बिंदु जोड़ता है, जो दुनिया भर में दर्ज किए गए हैं। इन अवलोकनों से धूमकेतु की कक्षीय गति को समझने में मदद मिलती है।
हालांकि शिलालेख की सटीक तिथि का अभी भी अध्ययन किया जा रहा है, शुरुआती विश्लेषण से पता चलता है कि यह उस अवधि से संबंधित है जब हैली का धूमकेतु विजयनागर साम्राज्य के दौरान दिखाई दिया होगा। इस खोज से प्राचीन भारतीय इतिहास और खगोल विज्ञान पर आगे के शोध के लिए नए रास्ते खुल गए हैं।
