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नई दिल्ली: बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के चुनाव आयोग (ECI) के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट 10 जुलाई को सुनवाई करेगा। सोमवार को न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल सहित कई याचिकाकर्ताओं की दलीलों को सुना और याचिकाओं पर गुरुवार को सुनवाई के लिए सहमति व्यक्त की।
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) सांसद मनोज झा, तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) और सामाजिक कार्यकर्ता योगेन्द्र यादव सहित कई नेताओं और संगठनों ने इस पुनरीक्षण प्रक्रिया को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि चुनाव आयोग का यह कदम मनमाना है और इससे लाखों मतदाताओं को, विशेषकर हाशिए पर पड़े समुदायों, प्रवासी श्रमिकों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को मताधिकार से वंचित किया जा सकता है। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया में नागरिकता साबित करने के लिए आधार कार्ड और राशन कार्ड जैसे सामान्य रूप से स्वीकार्य दस्तावेजों को शामिल नहीं किया गया है, जिससे लोगों को अनावश्यक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि बिहार में पिछली मतदाता सूची का प्रकाशन जनवरी 2025 में ही हुआ था, जिसमें नाम अपडेट करने और हटाने का काम किया गया था। ऐसे में चुनावों से ठीक पहले एक और विशेष गहन पुनरीक्षण की क्या आवश्यकता है, यह समझ से परे है। उन्होंने यह भी कहा है कि इस पुनरीक्षण के लिए निर्धारित समय-सीमा बहुत कम है, जिससे यह प्रक्रिया निष्पक्ष रूप से पूरी नहीं हो सकती।
विपक्षी दलों ने एकजुट होकर चुनाव आयोग के इस फैसले का विरोध किया है और इसे “मतदाता-बंदी” करार दिया है। उनका कहना है कि यह दलितों, पिछड़ों, अति-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के वोट काटने की एक साजिश है।
सुप्रीम कोर्ट अब 10 जुलाई को इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करेगा और यह देखेगा कि चुनाव आयोग के फैसले में कोई संवैधानिक या कानूनी खामी तो नहीं है, जिससे मतदाताओं के अधिकारों का हनन हो।
