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उत्तरी ध्रुव के उष्णकटिबंधीय स्थलों से मिले 1.8-2 करोड़ साल पुराने इनेमल प्रोटीन ने सुलझाई विलुप्त प्रजातियों की पेलियोबायोलॉजी

Source The Hindu

ओटावा/लखनऊ: एक अभूतपूर्व वैज्ञानिक खोज में, कनाडा के उच्च आर्कटिक (High Arctic) क्षेत्रों के उष्णकटिबंधीय स्थलों से प्राप्त 1.8 से 2 करोड़ साल पुराने इनेमल प्रोटीन ने विलुप्त प्रजातियों के पेलियोबायोलॉजी (पुराजीव विज्ञान) को समझने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। यह पहली बार है जब इतनी पुरानी और उष्णकटिबंधीय परिस्थितियों में संरक्षित इनेमल प्रोटीन का विश्लेषण किया गया है, जिसने वैज्ञानिकों को विलुप्त हो चुके जानवरों के जीवन और विकास के बारे में नई जानकारी प्रदान की है।

परंपरागत रूप से, जीवाश्म रिकॉर्ड में डीएनए और प्रोटीन का संरक्षण ठंडी और शुष्क परिस्थितियों में बेहतर माना जाता रहा है। हालांकि, यह नई खोज, जो संभवतः हाल ही में एक प्रमुख वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुई है, इस धारणा को चुनौती देती है। उच्च आर्कटिक के उन स्थानों से जहां कभी उष्णकटिबंधीय जलवायु थी, ऐसे प्राचीन इनेमल प्रोटीन का मिलना वैज्ञानिकों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है। इनेमल, दांतों की सबसे बाहरी और सबसे कठोर परत होती है, जो इसे अत्यधिक प्रतिरोधी बनाती है और लाखों वर्षों तक संरक्षित रहने की क्षमता प्रदान करती है।

इस खोज से जुड़े वैज्ञानिकों का मानना है कि इन इनेमल प्रोटीन के विश्लेषण से विलुप्त हो चुके जीवों के आहार, उनके शरीर के तापमान, और यहां तक कि उनके विकासात्मक पैटर्न के बारे में भी जानकारी मिल सकती है। प्रोटीन के एमिनो एसिड अनुक्रमों का अध्ययन करके, शोधकर्ता उन प्रजातियों के विकासवादी संबंधों को भी बेहतर ढंग से समझ सकते हैं, जिनके जीवाश्म अवशेष अपूर्ण या अनुपलब्ध हैं।

यह सफलता पेलियोप्रोटिओमिक्स (paleoproteomics) के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जो प्राचीन प्रोटीन का अध्ययन करता है। यह न केवल विलुप्त प्रजातियों के बारे में हमारी समझ को गहरा करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि प्रोटीन कैसे और किन परिस्थितियों में लाखों वर्षों तक संरक्षित रह सकते हैं। यह भविष्य में ऐसी और भी खोजों के द्वार खोलता है जो पृथ्वी के अतीत के अनसुलझे रहस्यों को उजागर कर सकती हैं। यह शोध आर्कटिक के अतीत की गर्म जलवायु और वहां जीवन के फलने-फूलने के बारे में भी नए दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने में भी सहायक हो सकता है।

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