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नई दिल्ली: एक नए अध्ययन के अनुसार, दुनिया की 9% से अधिक भूमि को पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाले संक्रमणों (जूनोटिक रोगों) के उच्च जोखिम वाले क्षेत्र के रूप में पहचाना गया है। इस जोखिम में वे क्षेत्र शामिल हैं जहां कोविड-19 जैसी महामारियों का प्रकोप हो सकता है। ‘साइंस एडवांसेज’ पत्रिका में प्रकाशित निष्कर्षों से पता चलता है कि वैश्विक आबादी का लगभग 3% अत्यधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में रहता है, जबकि लगभग पांचवां हिस्सा मध्यम जोखिम वाले क्षेत्रों में निवास करता है।
अध्ययन में कहा गया है कि वैश्विक भूमि सतह का 9.3% “उच्च” (6.3%) या “बहुत उच्च” (3%) जोखिम में है। यह भी अनुमान लगाया गया है कि लैटिन अमेरिका (27%) और ओशिनिया (18.6%) के बाद एशिया की लगभग 7% और अफ्रीका की 5% भूमि उच्च और बहुत उच्च प्रकोप के जोखिम में है।
यह अध्ययन ग्लोबल इन्फेक्शियस डिजीज एंड एपिडेमियोलॉजी नेटवर्क (GIDEON) डेटासेट और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की प्राथमिक बीमारियों की सूची से स्थान-विशिष्ट जानकारी का विश्लेषण करके किया गया है। शोधकर्ताओं ने उन नौ जूनोटिक बीमारियों पर ध्यान केंद्रित किया, जिनमें गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति पैदा करने की उच्च क्षमता है, जैसे कि इबोला, मर्स (MERS), सार्स (SARS) और निपाह वायरस।
अध्ययन इस बात पर प्रकाश डालता है कि जलवायु परिवर्तन से संबंधित कारक, जैसे बढ़ते तापमान, बदलते वर्षा पैटर्न और पानी की कमी, कुछ क्षेत्रों की भेद्यता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। ये निष्कर्ष नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं ताकि वे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान कर सकें और जूनोटिक खतरों से निपटने के लिए अपनी प्रतिक्रिया क्षमताओं में सुधार कर सकें, संसाधनों को प्रभावी ढंग से आवंटित कर सकें और वैश्विक स्वास्थ्य खतरों से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा दे सकें।
यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब हाल ही में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के एक अध्ययन में पाया गया था कि भारत में 2018 से 2023 के बीच दर्ज किए गए कुल 6,948 प्रकोपों में से 583 (8.3%) जूनोटिक थे। यह दर्शाता है कि पशु-मानव संक्रमण का खतरा एक वैश्विक चिंता का विषय है, जिसके लिए समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है।
