Source The Economics Times
नई दिल्ली: अखिल भारतीय बैंक अधिकारी परिसंघ (AIBOC) ने आईडीबीआई बैंक के प्रस्तावित निजीकरण का कड़ा विरोध किया है। संघ ने सरकार के इस कदम को सार्वजनिक बैंकिंग प्रणाली की नींव पर एक सीधा प्रहार और 2003 में संसद में दिए गए आश्वासनों का विश्वासघात बताया है। AIBOC के अनुसार, आईडीबीआई बैंक का निजीकरण केवल शेयरों की बिक्री नहीं है, बल्कि यह लोगों की बचत को बेचना और देश के सार्वजनिक बैंकिंग नेटवर्क को कमजोर करना है।
संघ ने एक प्रेस बयान जारी कर कहा कि सरकार को निजीकरण की योजना को तुरंत वापस लेना चाहिए। AIBOC का कहना है कि सरकार को बैंक की शासन व्यवस्था को मजबूत करने, डिजिटल आधुनिकीकरण में तेजी लाने और इसकी विकासात्मक भूमिका का विस्तार करने पर ध्यान देना चाहिए। संघ ने इस बात पर जोर दिया कि निजीकरण सुधार नहीं, बल्कि पीछे हटना है।
सरकार की वर्तमान योजना के तहत, भारत सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) संयुक्त रूप से IDBI बैंक में अपनी 60.72% हिस्सेदारी बेच रहे हैं। हालांकि, AIBOC का तर्क है कि यह कदम उस संसदीय आश्वासन के खिलाफ है जिसमें कहा गया था कि बैंक में सरकारी स्वामित्व 51% से नीचे नहीं जाएगा।
AIBOC ने चेतावनी दी है कि आईडीबीआई बैंक का निजीकरण वित्तीय बहिष्करण (financial exclusion) का कारण बन सकता है और सामाजिक न्याय व आर्थिक संप्रभुता को खतरे में डाल सकता है। संघ का मानना है कि राष्ट्र निर्माण के लिए मजबूत सार्वजनिक बैंकों की आवश्यकता होती है, न कि ऐसे संस्थानों की जो केवल लाभ कमाने के लिए काम करते हैं। इस विरोध को देखते हुए आने वाले दिनों में बैंक यूनियनों द्वारा और भी आंदोलनात्मक कदम उठाए जा सकते हैं।
यह वीडियो बताता है कि आईडीबीआई बैंक के निजीकरण की प्रक्रिया क्या है और इसके क्या निहितार्थ हो सकते हैं।
