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AIIMS अध्ययन: दिल्ली के निजी स्कूलों में बच्चों में मोटापे की बढ़ती समस्या, हृदय रोगों का बढ़ता खतरा

नई दिल्ली, 30 मई 2025: अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में खुलासा हुआ है कि दिल्ली के शीर्ष निजी स्कूलों में पढ़ने वाले हर तीसरे बच्चे को मोटापे की समस्या है। यह स्थिति अत्यधिक भोजन और अस्वास्थ्यकर जीवनशैली के कारण उत्पन्न हो रही है, जिससे बच्चों में हृदय रोगों का खतरा बढ़ रहा है।

मोटापे के कारण और प्रभाव

AIIMS और जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा 7,000 छात्रों पर दो वर्षों तक किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि निजी स्कूलों के बच्चे अपनी दैनिक आवश्यकता से चार गुना अधिक भोजन कर रहे हैं। इससे उनमें टाइप 2 मधुमेह, उच्च रक्तचाप, ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) और फैटी लीवर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। अध्ययन में लगभग 90 बच्चों में OSA के लक्षण और 40 बच्चों में प्री-डायबिटिक संकेत पाए गए।

सामाजिक-आर्थिक स्थिति का प्रभाव

AIIMS के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया ने बताया कि मोटापे की समस्या सीधे तौर पर आर्थिक स्थिति से जुड़ी है। समृद्ध परिवारों के बच्चे इस समस्या से अधिक प्रभावित हैं, क्योंकि वे अस्वास्थ्यकर भोजन का अधिक सेवन करते हैं और उनकी शारीरिक गतिविधि कम होती है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि कई माता-पिता इस समस्या को स्वीकार नहीं करते और परामर्श सत्रों में भाग लेने से इनकार करते हैं।

हृदय रोगों का बढ़ता खतरा

AIIMS के हृदय रोग विभाग के प्रमुख डॉ. राजीव नरंग ने चेतावनी दी है कि मोटापा हृदय रोगों का एक प्रमुख कारण है। उन्होंने लोगों से अपने बॉडी मास इंडेक्स (BMI) और कमर की माप की निगरानी करने की सलाह दी है, क्योंकि पेट के आसपास की चर्बी हृदय रोग और उच्च रक्तचाप के जोखिम को बढ़ाती है।

समाधान और सुझाव

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए जीवनशैली में बदलाव आवश्यक है। बच्चों को संतुलित आहार के महत्व के बारे में शिक्षित करना, स्कूलों में पोषण शिक्षा को बढ़ावा देना और शारीरिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना आवश्यक है। इसके अलावा, माता-पिता को बच्चों के भोजन की योजना बनाते समय स्वस्थ विकल्पों को प्राथमिकता देनी चाहिए और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए।

निष्कर्ष

बढ़ता हुआ बाल मोटापा न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए खतरा है, बल्कि यह देश की स्वास्थ्य प्रणाली और अर्थव्यवस्था पर भी दबाव डाल सकता है। इसलिए, परिवारों, स्कूलों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों को मिलकर इस समस्या से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।

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