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भारत में घटती प्रजनन दर: एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट

Source Times Entertainment

नई दिल्ली – भारत, जो कभी अपनी विशाल जनसंख्या वृद्धि के लिए जाना जाता था, अब एक नए जनसांख्यिकीय संकट का सामना कर रहा है: तेजी से गिरती प्रजनन दर। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के हालिया आंकड़ों से पता चला है कि भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) अब 2.0 है, जो प्रतिस्थापन स्तर (replacement level) 2.1 से नीचे है। यह एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जो देश के भविष्य के लिए गंभीर चुनौतियां पेश कर रहा है।

घटती प्रजनन दर के कारण

गिरती प्रजनन दर के कई कारण हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:

* शिक्षा और जागरूकता में वृद्धि: महिलाओं में शिक्षा का स्तर बढ़ने से वे अपने करियर और जीवन के बारे में अधिक जागरूक हुई हैं। इससे शादी की उम्र में देरी और बच्चों की संख्या को सीमित करने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

* परिवार नियोजन का बढ़ता उपयोग: सरकार के प्रयासों और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच में सुधार के कारण परिवार नियोजन के साधनों का उपयोग बढ़ा है।

* शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली: शहरों में रहने की बढ़ती लागत, व्यस्त जीवनशैली और छोटे परिवारों की ओर झुकाव ने भी प्रजनन दर को प्रभावित किया है।

* महिला सशक्तिकरण: महिलाओं का आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी ने उन्हें अपने परिवार के आकार को नियंत्रित करने की शक्ति दी है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

प्रजनन दर में गिरावट का सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है:

* जनसंख्या की उम्र बढ़ना (Population Aging): कम जन्म दर का मतलब है कि आने वाले समय में युवा आबादी की तुलना में बुजुर्गों की संख्या अधिक होगी। इससे बुजुर्गों की देखभाल, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर दबाव बढ़ेगा।

* श्रम शक्ति में कमी: युवा आबादी में कमी से देश की श्रम शक्ति प्रभावित होगी, जिससे आर्थिक विकास की गति धीमी हो सकती है।

* लिंग असंतुलन: कुछ क्षेत्रों में, खासकर जहां बेटों की चाहत अधिक है, प्रजनन दर में गिरावट से लिंग अनुपात में और असंतुलन आ सकता है।

* स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव: बुजुर्ग आबादी बढ़ने से गैर-संक्रामक रोगों (जैसे मधुमेह, हृदय रोग) का बोझ बढ़ेगा, जिससे स्वास्थ्य प्रणाली पर अधिक दबाव पड़ेगा।

सरकार और समाज के लिए चुनौती

यह स्थिति सरकार और समाज दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती है। सरकार को इस जनसांख्यिकीय बदलाव के लिए तैयार रहना होगा। इसके लिए:

* स्वास्थ्य नीतियों का पुनर्मूल्यांकन: बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य देखभाल, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को मजबूत करना होगा।

* कार्यबल को बढ़ावा देना: महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी को बढ़ाना और कौशल विकास पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक होगा।

* परिवार कल्याण कार्यक्रमों को संतुलित करना: जहां परिवार नियोजन को प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण है, वहीं अब इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि यह प्रजनन दर पर नकारात्मक प्रभाव न डाले।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति भारत के लिए एक अवसर भी हो सकती है, बशर्ते कि हम इन चुनौतियों का सामना करने के लिए समय पर और प्रभावी कदम उठाएं। शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करके भारत एक स्वस्थ और संतुलित भविष्य का निर्माण कर सकता है। लेकिन इसके लिए, इस जनसांख्यिकीय बदलाव को एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में स्वीकार करना और उसके अनुसार योजना बनाना आवश्यक है।

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