Source The Indian Express
नई दिल्ली: अगर आप सोचते हैं कि वायु प्रदूषण सिर्फ खांसी या सांस की बीमारियों का कारण बनता है, तो आप गलत हो सकते हैं। एक नए व्यापक अध्ययन में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं कि लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से डिमेंशिया (मनोभ्रंश) का खतरा काफी बढ़ सकता है। यह अध्ययन कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है और इसे प्रतिष्ठित पत्रिका “द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ” में प्रकाशित किया गया है।
अध्ययन के मुख्य बिंदु:
* बढ़ता खतरा: इस अध्ययन में 2.9 करोड़ से अधिक प्रतिभागियों के डेटा का विश्लेषण किया गया, जो अब तक का सबसे बड़ा और व्यापक विश्लेषण है। निष्कर्षों से पता चला है कि PM2.5 (2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम व्यास वाले सूक्ष्म कण) के स्तर में प्रत्येक 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि से डिमेंशिया का सापेक्ष जोखिम 17% तक बढ़ जाता है।
* कालिक कण (Soot) का प्रभाव: अध्ययन में यह भी सामने आया कि कालिख (soot) जैसे प्रदूषक, जो वाहनों के धुएं और लकड़ी जलाने से निकलते हैं, के 1 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के संपर्क से डिमेंशिया का जोखिम 13% बढ़ जाता है।
* नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2): नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के स्तर में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि से डिमेंशिया का जोखिम 3% तक बढ़ता है।
* मस्तिष्क पर सीधा असर: शोधकर्ताओं के अनुसार, वायु प्रदूषण के सूक्ष्म कण मस्तिष्क में प्रवेश कर सकते हैं और सूजन तथा ऑक्सीडेटिव तनाव का कारण बन सकते हैं, जिससे मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान होता है और डिमेंशिया का खतरा बढ़ता है।
* विशेष रूप से वैस्कुलर डिमेंशिया: अध्ययन में यह भी पाया गया कि वायु प्रदूषकों का प्रभाव वैस्कुलर डिमेंशिया पर विशेष रूप से गंभीर होता है, जो मस्तिष्क में रक्त प्रवाह कम होने के कारण होता है।
यह क्यों मायने रखता है?
डिमेंशिया एक गंभीर मानसिक स्थिति है जिसमें याददाश्त, सोचने की क्षमता, भाषा और व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। विश्व स्तर पर 5.7 करोड़ से अधिक लोग डिमेंशिया से प्रभावित हैं, और 2050 तक यह संख्या लगभग तिगुनी होकर 15.2 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के डॉ. क्रिश्चियन ब्रेडेल, जो अध्ययन के सह-लेखक हैं, ने बताया, “ये निष्कर्ष डिमेंशिया की रोकथाम के लिए एक अंतर-अनुशासनात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता पर जोर देते हैं। डिमेंशिया को रोकना केवल स्वास्थ्य सेवा की जिम्मेदारी नहीं है; यह अध्ययन इस बात को मजबूत करता है कि शहरी नियोजन, परिवहन नीति और पर्यावरणीय विनियमन सभी की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है।”
यह अध्ययन उन शहरों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जहां वायु प्रदूषण का स्तर लगातार खतरनाक बना हुआ है, खासकर भारत जैसे देशों के लिए जहां की अधिकांश आबादी उच्च प्रदूषण वाले क्षेत्रों में रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि वायु प्रदूषण को कम करके डिमेंशिया के हजारों मामलों को रोका जा सकता है और स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी बोझ को कम किया जा सकता है।
यह नया शोध वायु गुणवत्ता सुधार के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है, ताकि न केवल शारीरिक स्वास्थ्य बल्कि मस्तिष्क के स्वास्थ्य को भी सुरक्षित रखा जा सके।
