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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए रेफ़रेंस पर सुनवाई सातवें दिन मंगलवार को भी जारी रही। यह रेफ़रेंस राज्यपालों के पास लंबित विधेयकों और उनके निस्तारण की समय-सीमा तय करने से जुड़ा है। केंद्र और कई राज्य सरकारों के बीच लंबे समय से इस मुद्दे पर विवाद चल रहा है।
मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। अदालत में आज अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने कहा कि राज्यपालों को ‘अनिश्चितकाल तक’ विधेयक लंबित रखने का अधिकार नहीं है, लेकिन संविधान उन्हें उचित समय में निर्णय लेने का विवेकाधिकार जरूर देता है।
अदालत की कार्यवाही
सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र से पूछा कि क्या ‘उचित समय’ की परिभाषा तय की जा सकती है या इसे परिस्थितियों पर छोड़ना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि राज्यपालों की भूमिका महज़ औपचारिक नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक जवाबदेही से भी जुड़ी हुई है।
वहीं, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे राज्यों की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने तर्क दिया कि राज्यपालों के पास विधेयक रोके रखने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करती है। उन्होंने कहा कि यदि कोई समय-सीमा तय नहीं की गई तो यह केंद्र-राज्य संबंधों में टकराव को और बढ़ाएगी।
आज की अहम टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “राज्यपाल संसद या विधानसभा के समानांतर शक्ति केंद्र नहीं बन सकते।”
अदालत ने संकेत दिया कि ‘उचित समय’ को लेकर कुछ दिशानिर्देश दिए जा सकते हैं, ताकि भविष्य में विवाद न हो।
सुनवाई के दौरान संविधान सभा की बहसों का भी हवाला दिया गया।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर रोजाना सुनवाई कर रहा है और उम्मीद है कि अगले हफ्ते तक इस पर महत्वपूर्ण निर्णय या अंतरिम दिशानिर्देश आ सकते हैं। यह फैसला भविष्य में केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन और संवैधानिक जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने में अहम भूमिका निभाएगा।
