Source HT
नई दिल्ली – हाल ही में सामने आए गूगल के नए वीडियो जेनरेशन मॉडल Veo 3 से बनाए गए एआई रिपोर्टर्स के वीडियो सोशल मीडिया पर हलचल मचा रहे हैं। इन वीडियोज़ की यथार्थता इतनी अधिक है कि असली और नकली में फर्क कर पाना मुश्किल हो गया है। इस तकनीकी चमत्कार को लेकर जहां एक ओर लोग इसकी प्रशंसा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इसके दुरुपयोग की आशंका से चिंता भी गहराने लगी है।
कुछ यूजर्स ने वीडियो देखकर कहा, “जनरल पब्लिक गई काम से।” कई विशेषज्ञों ने चेताया है कि इस तकनीक का इस्तेमाल फेक न्यूज, गुमराह करने वाली रिपोर्टिंग और डीपफेक के ज़रिए सामाजिक तनाव बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।
Google Veo 3 एक उन्नत वीडियो निर्माण मॉडल है जो केवल टेक्स्ट इनपुट के आधार पर उच्च गुणवत्ता वाले, यथार्थवादी वीडियो बना सकता है। इसका उपयोग करके बनाए गए एआई रिपोर्टर्स न केवल बोलते हैं, बल्कि उनके हावभाव, चेहरे के एक्सप्रेशन्स और संवादों में इतनी सटीकता है कि वे बिल्कुल असली न्यूज़ एंकर लगते हैं।
तकनीकी विशेषज्ञों की राय:
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक से भरोसेमंद सूचना और प्रचार के बीच की रेखा धुंधली हो सकती है। अगर इस पर नियंत्रण नहीं रखा गया, तो इसका इस्तेमाल चुनावों को प्रभावित करने, अफवाहें फैलाने और जनमत को मोड़ने में किया जा सकता है।
सरकारी दृष्टिकोण:
भारत सरकार और अन्य देशों की एजेंसियां एआई-जनित कंटेंट पर निगरानी और नियमन की रूपरेखा तैयार करने पर विचार कर रही हैं।
निष्कर्ष:
AI तकनीक निश्चित रूप से पत्रकारिता और कंटेंट निर्माण में क्रांति ला सकती है, लेकिन इसके साथ आने वाले खतरों को नज़रअंदाज़ करना जोखिम भरा हो सकता है। समय आ गया है कि इस क्षेत्र में भी नीति और नियम बनाए जाएं ताकि इसका दुरुपयोग रोका जा सके।
