Source The Indian Express
नई दिल्ली: 20 नवंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट (SC) की एक संविधान पीठ ने एक महत्वपूर्ण राष्ट्रपति संदर्भ (Presidential Reference) पर अपनी राय दी, जिसमें राज्यपाल और राष्ट्रपति द्वारा राज्य विधानमंडलों द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने या रोकने की शक्तियों से संबंधित 14 प्रश्न पूछे गए थे। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि अदालतों द्वारा राज्यपालों या राष्ट्रपति के लिए विधेयकों पर कार्रवाई करने की कोई निश्चित समय-सीमा (fixed timelines) तय नहीं की जा सकती है, लेकिन वे अनिश्चित काल तक कार्रवाई को रोक (indefinitely withhold) नहीं सकते हैं।
⚖️ मुख्य बातें और न्यायालय के उत्तर:
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 200 और अनुच्छेद 201 की व्याख्या करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदुओं पर राय दी:
निश्चित समय-सीमा नहीं: न्यायालय ने कहा कि संविधान में कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं होने के कारण, न्यायपालिका राज्यपाल या राष्ट्रपति को विधेयक पर निर्णय लेने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा नहीं दे सकती है। ऐसा करना शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के विरुद्ध होगा।
विलंब पर न्यायिक समीक्षा: हालांकि, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल किसी विधेयक पर अनिश्चितकालीन विलंब (indefinite delay) नहीं कर सकते हैं। यदि विलंब अत्यधिक, अस्पष्ट और निरंतर है, तो यह न्यायिक समीक्षा (judicial review) के अधीन हो सकता है। न्यायालय सीमित परिस्थितियों में राज्यपाल को ‘उचित समय’ (reasonable time) के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दे सकता है।
राज्यपाल के विकल्प (अनुच्छेद 200): राज्यपाल के पास विधेयक प्रस्तुत किए जाने पर केवल तीन संवैधानिक विकल्प हैं:
मंजूरी देना (Grant Assent)।
विधेयक को रोकना और सदन को वापस लौटाना (Withhold assent and return the Bill to the Legislature)।
राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करना (Reserve the Bill for the President’s consideration)।
देम्ड एसेंट (Deemed Assent) की अवधारणा अस्वीकार: न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ‘देम्ड एसेंट’ (मान ली गई सहमति) की कोई अवधारणा संविधान में निहित नहीं है, और ऐसा कोई भी आदेश देना न्यायपालिका द्वारा संवैधानिक अधिकारियों के कार्यों पर कब्जा करने जैसा होगा।
मंत्रिपरिषद की सलाह: न्यायालय ने कहा कि विधेयक पर निर्णय लेने के विशिष्ट कार्य में, राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह से बाध्य (not bound by the advice) नहीं होते हैं। यदि वे मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे होते, तो वे पुनर्विचार के लिए विधेयक को कभी वापस नहीं कर पाते।
संघवाद और संवाद: न्यायालय ने रेखांकित किया कि राज्यपालों को सहकारी संघवाद (cooperative federalism) की भावना का पालन करना चाहिए और राज्य विधानमंडलों के साथ संवाद स्थापित करना चाहिए, न कि अवरोधक दृष्टिकोण (obstructionist approach) अपनाना चाहिए।
इस राय से केंद्र और विपक्षी दलों के शासन वाले राज्यों के बीच राज्यपालों की भूमिका को लेकर चल रहे विवादों पर कुछ हद तक संवैधानिक स्पष्टता आने की उम्मीद है।
