जम्मू-कश्मीर में राज्य का दर्जा बहाल करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि ‘जमीनी हकीकत को देखना होगा’ और ‘पहलगाम हमले को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।’ यह टिप्पणी सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की है, जिसमें केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर में राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी।
इस याचिका को एक कॉलेज के शिक्षक ज़हूर अहमद भट्ट और सामाजिक कार्यकर्ता खुर्शीद अहमद मलिक ने दायर किया था। उनकी ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 370 के मामले में सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले में राज्य का दर्जा ‘जितनी जल्दी हो सके’ बहाल करने की बात कही गई थी, लेकिन इसकी कोई समयसीमा तय नहीं की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि शांतिपूर्ण चुनाव हो चुके हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि सुरक्षा संबंधी चिंताएं अब कोई बाधा नहीं हैं। उनका यह भी तर्क था कि राज्य का दर्जा बहाल न करना संघवाद के सिद्धांत का उल्लंघन है, जो संविधान की एक मूलभूत विशेषता है।
इस पर, सुप्रीम कोर्ट के बेंच में शामिल CJI बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन ने मौखिक रूप से कहा कि अदालतों को जम्मू-कश्मीर में मौजूदा ‘जमीनी हकीकत’ पर विचार करना होगा। उन्होंने हाल ही में हुए पहलगाम आतंकी हमले का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे हमलों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
वहीं, केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह याचिका सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि इसी तरह की पिछली याचिकाओं पर अदालत ने जुर्माना लगाया था। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं की मांग को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई आठ हफ्ते बाद तय की है। इस दौरान केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करने का समय दिया गया है। इस मामले में अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर टिकी हैं कि वह इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है। यह फैसला जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
