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पडरौना, उत्तर प्रदेश: भारतीय क्रिकेट के ‘नई दीवार’ कहे जाने वाले चेतेश्वर पुजारा के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास की घोषणा ने क्रिकेट प्रेमियों और विशेषज्ञों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है: क्या हमने टेस्ट क्रिकेट में विशेषज्ञों का अंतिम दौर देख लिया है?
पुजारा, जो अपनी अटूट एकाग्रता, धैर्य और लंबी पारियां खेलने की क्षमता के लिए जाने जाते थे, आधुनिक क्रिकेट के टी-20 और वनडे प्रारूपों के तेज़-तर्रार स्वभाव से काफी अलग थे। उनका खेल पूरी तरह से टेस्ट क्रिकेट की मांगों के अनुरूप था, जहां विकेट पर टिके रहना और विरोधियों को थका देना ही सफलता की कुंजी मानी जाती थी।
टेस्ट विशेषज्ञ: एक लुप्तप्राय प्रजाति?
पिछले कुछ दशकों में, क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में खेलने वाले ‘ऑल-फॉर्मेट’ खिलाड़ियों का उदय हुआ है। विराट कोहली, रोहित शर्मा, स्टीव स्मिथ और केन विलियमसन जैसे खिलाड़ी टेस्ट, वनडे और टी-20 तीनों में समान रूप से सफल रहे हैं। इसके विपरीत, पुजारा जैसे खिलाड़ी, जो केवल टेस्ट क्रिकेट पर ध्यान केंद्रित करते थे, धीरे-धीरे कम होते गए हैं।
इसका मुख्य कारण व्यस्त अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम और फ्रेंचाइजी लीगों का बढ़ता प्रभाव है। खिलाड़ी अक्सर एक साथ कई प्रारूपों में खेलना पसंद करते हैं, क्योंकि इससे उन्हें अधिक अवसर और वित्तीय लाभ मिलता है। इसके अलावा, आधुनिक टेस्ट क्रिकेट भी अब पहले से कहीं अधिक तेज़ गति से खेला जाने लगा है, जिसमें स्कोरिंग रेट और स्ट्राइक रेट पर भी ध्यान दिया जाता है।
पुजारा ने अपने करियर में 100 से अधिक टेस्ट मैच खेले और भारत के लिए कई महत्वपूर्ण पारियां खेलीं, खासकर विदेशी पिचों पर। ऑस्ट्रेलिया में उनकी 2018-19 की ऐतिहासिक टेस्ट श्रृंखला जीत में उनकी भूमिका अविस्मरणीय है। उन्होंने साबित किया कि धैर्य और दृढ़ संकल्प आज भी टेस्ट क्रिकेट में उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने पहले कभी थे।
हालांकि, उनके संन्यास के बाद, भारतीय टीम में अब कोई भी ऐसा खिलाड़ी नहीं है जो पूरी तरह से टेस्ट विशेषज्ञ हो। शुभमन गिल, यशस्वी जायसवाल और श्रेयस अय्यर जैसे युवा खिलाड़ी तीनों प्रारूपों में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय क्रिकेट टेस्ट विशेषज्ञों की कमी को कैसे पूरा करता है।
यह संभव है कि आने वाले समय में हमें कुछ ऐसे खिलाड़ी देखने को मिलें जो अपनी तकनीकी क्षमताओं के कारण केवल टेस्ट क्रिकेट में ही उत्कृष्ट प्रदर्शन करें, लेकिन उनका प्रतिशत निश्चित रूप से कम होगा। क्रिकेट के बदलते परिदृश्य में, पुजारा जैसे ‘दीवार’ का युग समाप्त होता दिख रहा है, और इसके साथ ही टेस्ट विशेषज्ञों की भूमिका पर भी सवालिया निशान लग गया है।
