Source The Hindu
बोस्टन, 19 सितम्बर 2025 — असाधारण और मज़ेदार शोधों के लिए दिया जाने वाला Ig Nobel पुरस्कार इस वर्ष भारत के दो शोधकर्ताओं को इंजीनियरिंग डिज़ाइन श्रेणी में मिला है। शिव नादर विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर विकास कुमार और उनके छात्र शोधकर्ता सार्थक मित्तल ने यह सम्मान अपने अनूठे शोध “बदबूदार जूतों और जूता रैक उपयोगकर्ता अनुभव” (shoe-rack user experience) से जीता है।
शोध का सार
शोध की शुरुआत इस तरह हुई कि मित्तल ने हॉस्टल के कमरों के बाहर जूते रखे हुए देखे। शुरुआत में ये माना गया कि समस्या जूता रैक की कमी की है, लेकिन बाद में यह पता चला कि असली समस्या बदबू की थी।
विकास कुमार एवं सार्थक मित्तल ने मिलकर एक ऐसा जूता रैक तैयार किया जिसमें UV-लैंप लगे हैं, जो जूतों में मौजूद बैक्टीरिया को मारने का काम करते हैं, ताकि बदबू को कम किया जा सके।
महत्वपूर्ण तथ्य
यह भारत के लिए इंजीनियरिंग डिज़ाइन श्रेणी में Ig Nobel पुरस्कार की एक गौरवपूर्ण उपलब्धि है।
शोध कार्य के पीछे अनुभव-आधारित डिज़ाइन, इंजीनियरिंग और माइक्रोबायोलॉजी का संयोजन है, यह दिखाते हुए कि रोज़मर्रा की छोटी-छोटी असुविधाएँ भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
Ig Nobel पुरस्कार क्या है?
Ig Nobel पुरस्कार एक अमेरिकी संस्था Annals of Improbable Research (AIR) द्वारा दिया जाता है, जिसका मकसद ऐसी शोधों को सम्मानित करना है जो पहले हँसाएँ, फिर सोचने पर मजबूर करें।
निष्कर्ष
इस उपलब्धि ने यह साबित किया है कि विज्ञान सिर्फ बड़े-बड़े प्रयोगशालाओं और जटिल सिद्धांतों तक सीमित नहीं है। रोजमर्रा की ज़िंदगी की छोटी-छोटी परेशानियाँ भी नवाचारी विचारों और वैज्ञानिक समाधानों के लिए प्रेरणा बन सकती हैं। विकास कुमार और सार्थक मित्तल का यह काम युवा शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हो सकता है कि वे अपनी दृष्टि को सरल, सहज और व्यवहार-उन्मुख रखें।
